Friday, 26 September 2008

नेहा रानी




मेरी बिटिया नेहा रानी नेह लगा कर चली गयी


हम सब उसकी बाट जोहते पर वोह लन्दन की भई


कहती डालर में पगार मिलता नही किसी की चिंता है


मौसम बरा सुहाना यहाँ का सब कुछ अच्हा लगता है


बचपन में नेहा चंचल थी दादी की पोती दुलारी थी


चाचा की प्यारी मौसी थी घर भर की वो प्यारी थी


उसकी बहादुरी के किस्से सुन कर सभी अचम्भा करते


कभी नही घबरायी वह चाहे विषम परिस्थिति होती


दिल्ली टेशन पर बचपन में चूथि पापा के तो होश ऊर गए


पापा से पहले टैक्सी से पहुची देख अचम्भित सभी रह गए
खेल कूद में वोह माहिर थी फैशन करना उसको आता
पर रिजल्ट उसका लेने जो जाता, संघ उसके वोह डाटा जाता

बचपन में जब स्कूल जाती , नए आइटम माँगा करती


कहती आज पुआ ले जाना मम्मी चची उससे डरती


स्कूल की शिसका पुरी करते कलकत्ता का टिकेट कराया कहती पाक - विद्या सीखेंगे होटल स्कूल में नाम लिखाया
ट्रेनिंग के बहाने लन्दन आ गई कहती अभी यही रहना हे अभी अभी तो लन्दन आए नए नए अनुभव लेना है
पल्ली दीदी की नेक सलाह उसे नही भाति हे दीदी जीजा अद्वय के संघ बातें कर कुश हो जाती है


नानी पूछे कब आयेगी समाचार सुन खुश हो जाती मामा हाल जानने को उक्सुक मामी उसकी बाट जोहती दिन में उसका हाल मिले ना मम्मी व्याकुल हो जाती हे पापा को उसका समाचार सुने बिन नीद नही आती है


मम्मी कहती वापस आजा बेटा, नेहा कहती आ जायेंगे अपना वतन परिवार हे अपना कभी भुला न पाएंगे

3 comments:

Sonal said...

very nice poem uncle, bahut emotional ho gaye padhne par
:-)
My message for Neha: arre Neha, itni senti poem padh kar to main kahin se bhi apne papa ke paas bhagi chali aati...India main tumhe bahut se jobs milenge aur ghar walon ka pyar bhi milega...hope to see you soon :-)..love..sonal.

pallavi said...

dear neha, chitthi ayi hai , ayi hai, vatan se chithi ayi ..... :D

gks said...
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